Saturday, August 25, 2007

तज़ुरबे

अब तो अपना अक्स भी अजनबी लगता है,
कि इन दीवारों पर अपनी तकदीर का इक तमाशा लगता है,
ये शहर भी अब जी चुका बहुत,
रास्ता भी नासाज़ मुसाफ़िर लगता है।

मेरे ख्वाब कहीं सो गये हैं,
उनींदी निगाहों से उनकी,
मेरा बेबस दर्द झलकता है ।

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