कल सारी रात,
आपकी आंखों पर बीती,
बहका था चाँद भी कल रात,
आप करीब थे हमारे,
आपके केसुओं में उलझे वो लम्हे,
शब भर सुलझाता रहा,
अपनी उन्गलियों से मैं,
वो लम्हे आपके होंठों की छुअन से,
पिघल कर मेरे आंसूं बन पड़े हों जैसे,
हां कल गुज़री उस चांदनी रात में
गुज़र गया मैं भी,
उन्ही लम्हों की तरह,
जो आंखों से बह चले थे,
बहका हुआ है चाँद
आज रात भी,
के आप मेरे ख्वाब में आईं हैं,
और मेरे लम्हे फ़िर उलझ पड़े हैं,
हां कल सारी रात आपकी आंखों पर बीती.......
Brilliant Piece of Work, I am big fan of yours, since I started reading.
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