लगायी थी गिरह एक,
डोर के दो सिरे जोड़ने के लिये,
पर जुड़ तो कुछ भी ना सका,
ऐंठ के रह गये दोनो,
अलबत्ता ये गिरह बहुत खटकेगी अब ।
शायद दो टुकड़ों का ही मुकद्दर था डोर का,
मैं ही चला था खुदा बनने।
ये सभी रचनाएं मेरे अत्यंत करीब हैं, कलम से कल्पना नही सीख पाया हूँ अभी, जो कुछ भी लिखा है, सब आप बीती ही है,
Tuesday, September 21, 2010
Saturday, September 18, 2010
तस्वीर
तुम्हारी एक तस्वीर देख के मन योँ इतराया,
के बस उड़ता-उड़ता फ़िरता है।
मुझसे पूछा धूमिल* की नज़रों ने,
है तो इक तस्वीर ही बन्धु,
बात तो'उनकी'आमद की होती,
ये कागज़ का इक टुकड़ा है।
प्रेम कवि हो लेश* मान्यवर,
ना मानो तो एक पुरज़ा है,
जो मानो तो 'उनका' मुखड़ा है।
मन सीली सी कुछ रातों में,
चाँद को तकते रहता था,
'उनकी' इस तस्वीर की बाबत,
अब सपने देखा करता है।
मिलने की'उनसे'आस का सपना,
'मिलन' से ज़्यादा मीठा है,
जल का असली स्वाद तो बन्धु,
दो दिन का प्यासा कहता है।
सावन के आने से पहले,
अकुल* मोर के मन से पूछो,
जब बादल ज़ोर गरजते हैं,
तब 'उसका' मन क्या करता है।
है तो इक तस्वीर ही प्यारे,
ये मैं भी खूब समझता हूँ,
नहीं फ़ासलों की मोहताज मोहब्बत,
इस कागज़ पे ही मरता हूँ।
*धूमिल : लवलेश मेरे एक परम् मित्र, सखा हैं, लेश जी जैसे 'उज्ज्वल ' कवि का उपनाम 'धूमिल' है, अब वो खुद ही जाने कि वो 'धूमिल' क्यों हैं, शायद श्री सुदामा पान्डेय 'धूमिल'जी के बड़े प्रशन्सक हैं।
*अकुल : एक काव्यात्मक स्वच्छन्दता का प्रतीक है, असल माने 'आकुल' या व्याकुल है।
*अकुल : एक काव्यात्मक स्वच्छन्दता का प्रतीक है, असल माने 'आकुल' या व्याकुल है।
Tuesday, September 14, 2010
यादें
रंग तुम्हारी यादों के,
कुछ यूँ तासीर बदलते हैं
कभी दिल हमको बहलाता है,
कभी हम दिल को फ़ुसलाते हैं।
इक बरफ़ीली सुबह का पाला,
नखलऊ की कम्बल ओढ़े है,
कुछ बेगम महल की यादें हैं,
औ कालेज के आंसू थोड़े हैं।
माँ से यूँ हंस कर शरमाना,
और प्यार का पहला लाल गुलाब,
छत पर जाके फ़ोन पे लड़ना,
दिखलाना शादी के ख्वाब।
चारबाग की चाय प्याली,
कैफ़े की काफ़ी भर याद,
झप्पी ट्रेन की खिड़की वाली,
ऐयरपोर्ट पर पहली रात।
मोबाइल पर नैन मटक्का,
जी मेल पर बीते रैन,
दो शहरों की प्रेम कहानी,
हर दम मिलने को बेचैन।
अब हो ब्याह तो बात बने,
ये मांग हमारी जारी है,
हमसे चबवाये लौह चने,
अब हालत भी बेचारी है।
रंग तुम्हारी यादों के,
कुछ यूँ तासीर बदलते हैं
कभी दिल हमको बहलाता है,
कभी हम दिल को फ़ुसलाते हैं।
कुछ यूँ तासीर बदलते हैं
कभी दिल हमको बहलाता है,
कभी हम दिल को फ़ुसलाते हैं।
इक बरफ़ीली सुबह का पाला,
नखलऊ की कम्बल ओढ़े है,
कुछ बेगम महल की यादें हैं,
औ कालेज के आंसू थोड़े हैं।
माँ से यूँ हंस कर शरमाना,
और प्यार का पहला लाल गुलाब,
छत पर जाके फ़ोन पे लड़ना,
दिखलाना शादी के ख्वाब।
चारबाग की चाय प्याली,
कैफ़े की काफ़ी भर याद,
झप्पी ट्रेन की खिड़की वाली,
ऐयरपोर्ट पर पहली रात।
मोबाइल पर नैन मटक्का,
जी मेल पर बीते रैन,
दो शहरों की प्रेम कहानी,
हर दम मिलने को बेचैन।
अब हो ब्याह तो बात बने,
ये मांग हमारी जारी है,
हमसे चबवाये लौह चने,
अब हालत भी बेचारी है।
रंग तुम्हारी यादों के,
कुछ यूँ तासीर बदलते हैं
कभी दिल हमको बहलाता है,
कभी हम दिल को फ़ुसलाते हैं।
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इसे लिख कर मज़ा आ गया..........
Saturday, September 11, 2010
बारिश
इस बार जाने बादलों में क्या होड़ लगी है,
बेइन्तेहां बरसते हैं,
मसरूफ़ियत की भी हद है भाई,
कहीं मन भी गीला नहीं हुआ,
और कहते हैं सूरत में तो बाढ़ ही आ गयी,
एक तो ये मौसम है,
और एक तुम हो,
एक अरसा हुआ सुने हुए,
एक झलक भी मयस्सर ना हुई तुम्हारी,
बस एक तस्वीर के सहारे,
सांस ले रहा हूं आज भी,
एक बार बाढ़ ही आ जाती तो क्या बात थी ........
Thursday, September 2, 2010
रात
ऐसा जान पड़ता था,
अब मन समझदार हो गया है शायद,
पर मारा है दस्तूर-ए-मोहब्ब्त का शायद,
गाहे बगाहे,
कई रातों को,
कोठरी में मेरी,
दरीचे के धुंधले कांच पे,
ओस गिर ही जाती है ।
वाह रे मालिक,
कभी एक रात खिसकती नहीं,
कभी उम्र शब में गुज़र जाती है ।
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..................बस लिख दिया
Tuesday, August 31, 2010
......
इस जुस्तजू के आलम में
अकेला ही सैर पे निकल पड़ा हूँ,
तुम्हारी इस कश्मकश में,
कुछ मैं भी उलझ पड़ा हूँ,
भारी है सांसें कुछ,
कोरी सब दीवारें हैं,
आँखों में खामोशी कुछ,
पर कहनी काफ़ी बातें हैं,
ना-उम्मीद ये शाम हुई है,
कागज़ की कोई नाव हो जैसे,
कदम चले उस मोड़ की जानिब,
दिन में कोई ख्वाब हो जैसे,
रस्ते भर बस तुम ही तुम हो,
हर ओर तुम्हारी यादें है,
जैसे टूटा कांच हो कोई,
हर टुकड़े में आँखें हैं,
एक बार जो मुझसे कहते तुम,
रंग जाती सारी दीवारें,
मेरा हाथ पकड़ गर चलते तुम,
जी लेते हम लम्हे सारे,
जाने अब कब लौटूंगा मैं,
काफ़ी दूर निकल आया हूँ,
मन्ज़िल की कोई चाह नहीं,
इस सैर में थोड़ा जी आया हूं......................
सोच के बैठा हूं,
ये बेरुखी भी तुम्हारा कोई अन्दाज़-ए-मोहब्बत ही होगा शायद,
इसे कोई और नाम न दे सकूंगा
Thursday, August 19, 2010
ये शहर
ये शहर,
ये सड़क,
वो लोग,
वो मकान,
और रस्ते का वो पेड़,
कुछ भी नहीं बदला,
मेरी गाड़ी कि पहियों के निशान अभी भी हैं,
उन बीते दिनों का असर अभी भी सुर्ख ही है,
कल मैं शाम के साथ टहलने गया था,
अपनी कुछ पुरानी चीज़ें ढूंढने गया था,
काका की मीठी चाय,
और मन्दिर की वो बेन्च समेटने गया था,
एक पत्ते पे लिख कर नाम अपना,
उड़ा दिया सड़क पर बस यूं ही,
और समा गया इस शहर के ज़ेहन में,
इस खानाबदोश महौल में,
पता ही नहीं चला,
कब ये शहर घरोंदा हो गया था।
तब तक,
वो ऊपर वाली शाख अनायास ही,
पूछ बैठी,
'कहो यार! आज अकेले ही आये हो?'
और बस,
सब कुछ धीरे धीरे बदल गया जैसे,
जवाब में मैं धीरे से मुस्कुरा दिया,
कहा 'चलता हूँ अब, देर हो रही है'
वो शाख समझदार है,
'गुड लक' कहा मुझको,
कहा .....................................'फ़िर आना'
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.....back to my alma matter
Tuesday, July 13, 2010
अन्तरद्व्ंद
सम्भावनाओं के सागर में,
आशा की एक नाव है,
इस पार आकांक्षा है,
उस पार मात्र कल्पना,
आवेश की अदनी पतवार है,
कितने दूर.......?
कितने दिन.........?
बस यही अन्तरद्व्ंद है..........
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..................बस लिख दिया
Tuesday, June 1, 2010
Friday, May 21, 2010
पोटली
एक गैरकानूनी शाम की बात है,
लखनऊ से चला,
दिल्ली से छूटा,
मुम्बई भी निकल गया,
रेलगाड़ी रुकी,
अहमदाबाद खड़ा था,
मोबाइल खींचा,
कहा:
'भाई आज रात'
बस फ़िर क्या था,
सूखे के इस दौर में,
तरावट की चाह जगी,
बन्टी भाई का बयाना हुआ,
लन्डी लन्डी* का फ़साना हुआ,
ढली जो शाम तो,
ढक्कन में कसी,
बोतल में फ़ंसी,
और बस्ते में दबी,
750 मि ली,
पुरानी यादें,
कुछ घूंट मोहब्बत,
थोड़े शिकवे,
सौ नखरे,
ढेरों आंसू,
एकाध कसक,
दोस्ती के किस्से,
और
पूरा लखनऊ शहर,
मैं'खरीद'लाया हूँ,
गांधी जी के देस में,
फ़िरन्गी ठर्रे के टेस्ट में,
देसी गाने गायेंगे,
गुलाम अली साहब तो रेगुलर हैं,
आज जगजीत को भी बुलायेंगे,
आज की शाम घुसन्ड* रंगीन होगी,
बेईमानों के लिये कोल्ड ड्रिन्क होगी,
मज़े की बात है यारों,
ये रंगीनियत,
दोगुनी महंगी,
और गैरकानूनी होगी,
सुना है
अब तो डिगरी बंटने वाली है,
रोज़गार की लाइन में सब हैं,
लव मैरिज की आस में सब हैं,
टिकट भी ले लिया हैगा ट्रेन का,
अब बस पैकिंग भर बाकी है,
इस बिछोह के दौर में,
कुछ गैरकानूनी पल,
पोटली में बांध रहा हूँ,
सब लोग ले जाना सफ़र में,
रस्ता काफ़ी लम्बा है,
किसी शाम खोल के इनको,
पी लिया करना,
बस थोड़ा सा मुझको भी,
जी लिया करना ......
*लन्डी लन्डी ~ slang (GCA special),contributing money for a common goal
*घुसन्ड ~ slang (GCA special), supreme, unmatched, beyond compare.
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तुम सबको समर्पित
Wednesday, May 19, 2010
ख्वाब
मोहलत के ये पल हैं,
खूबसूरत सही पर कम हैं,
किवाड़ पे इन्तेज़ार बैठा है,
सिरहाना रोशनी से भीगा है,
चांदनी के रेशम में,
पलछिन मोती पोरे हैं,
पेशानी पर दिखते हैं,
ख्वाब ये सारे तोरे हैं,
मय के प्याले औंधे हैं,
उलझी रात ये आधी है,
मूंदी पलकें सोई हैं,
वीराने में खोई हैं,
ख्वाबों की ये दुनिया है,
कुछ धुंधली सी कड़ियाँ हैं,
यहाँ सहर होती ही नहीं,
कभी रात सोती ही नहीं,
बोतल भर इन्तेज़ार किया,
प्याली दर प्याली प्यार किया,
यूं खाली पैमाना रात जगे,
लुढके तोरी राह तके,
कांच की बोतल,
कांच के ख्वाब,
खाली प्याले खाली हाथ,
एक रात का सच्चा साथ,
मय का मैं और मेरी तुम,
मैं, मय, ख्वाब और तुम,
मय का ख्वाब,
ख्वाब में तुम......
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बोतल भर इन्तेज़ार किया
Saturday, March 27, 2010
पंकज
कमती यादें,
कितनी रातें,
आज लिखूँ मैं सारी बातें,
सारे झगड़े,
सारे गीत,
एक अजब सी अपनी प्रीत,
साथ में खोये,
साथ में रोये,
माँ के सारे बरतन टोये,
रोज़ की होली,
रोज़ दिवाली,
निकली शैतानों की टोली,
एक ही सैकल,
दोनों सवारी,
आधे पैसे की बेगारी,
जेब में ठन ठन,
बरफ़ का है मन,
आठ आने की दुनिया सारी,
एक ही कन्या,
दो दीवाने,
मन में चलते ताने-बाने,
आज लड़कपन,
परसों बड़प्पन,
साथ में देखी अब तक छप्पन,
कुछ दूर हुए,
कुछ साथ रहा,
बरसों का बचपन पास रहा,
पर ये आज कैसी दूरी है,
क्यूँ मेरी मजबूरी है,
जब तुम भइया कहते थे,
हाथ पकड़ कर चलते थे,
सब कुछ पीछे छूट गया,
मेरे दिल का टुकड़ा रूठ गया,
इक छोटे से झटके से,
जीवन का धागा टूट गया,
आज अकेला पहिया हूँ,
बिन पतवार खेवैइया हूँ,
अब नदी नहीं,
नाव नहीं,
अब मुझमें कोई भाव नहीं,
पर वो भी तो जीती है,
रोज़ाना आंसू पीती है,
वो मोती बनकर बहती है,
बस आंखों से ही कहती है,
तेरी आहट की बाट जोहती,
खामोशी भी सुनती है.........
Wednesday, March 24, 2010
कल सारी रात
कल सारी रात,
आपकी आंखों पर बीती,
बहका था चाँद भी कल रात,
आप करीब थे हमारे,
आपके केसुओं में उलझे वो लम्हे,
शब भर सुलझाता रहा,
अपनी उन्गलियों से मैं,
वो लम्हे आपके होंठों की छुअन से,
पिघल कर मेरे आंसूं बन पड़े हों जैसे,
हां कल गुज़री उस चांदनी रात में
गुज़र गया मैं भी,
उन्ही लम्हों की तरह,
जो आंखों से बह चले थे,
बहका हुआ है चाँद
आज रात भी,
के आप मेरे ख्वाब में आईं हैं,
और मेरे लम्हे फ़िर उलझ पड़े हैं,
हां कल सारी रात आपकी आंखों पर बीती.......
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intimacies....
इन्तेज़ार
यूँ तो कई रातें,
आपके इन्तेज़ार की छड़ी के सहारे,
इन्ही चार दीवारों के दरम्यान,
अन्धेरों को टटोलते टटोलते गुज़ार दी है हमनें,
पर आज की ये रात,
बिछोने पर पड़ी सिलवटों के बीच गिरे,
कुछ मेरे ख्वाब ज़िन्दा हो गये हैं,
आज की ये रात कमबख्त खिसकती ही नहीं है,
मेरी हर सांस फ़ेफ़ड़ों से गले तक आते आते,
अपनी आंच से मेरे आंसुओं को,
बिखरने से पहले ही धुआं किये दे रही है।
और धुएं के ये छोटे छोटे बादल,
इसी नुकीली हवा में रुइ के फ़ाहों के मानिन्द,
इधर उधर बहक रहे हैं,
मेरे जले हुए आंसुओं की ओस के मोतियों के ज़ेवर पहन कर,
कल ज़र्रा ज़र्रा सूरज की रोशनी में इतरा उठेगा,
और तब,
मेरी सांस की तपन,
खिड़की के इस धुन्धले कांच पर,
मेरे जले हुए आंसुओं के धुएं से,
कल आने वाली रात का इन्तेज़ार फ़िर से लिख देगी,
के आज की ये रात तो कम्बखत खिसकती ही नहीं........
Thursday, July 2, 2009
मेरे साथ भी कोई रहता है……
परछाइं बनके चल देती,
किताबों के पन्नो से फ़िसलती,
आपकी तस्वीरों से गिरती,
कभी सर-ए-शाम नुक्कड पे
हँस देती……
यूं ही सडक पे घूमती…
छत पे,
मुन्डेर पे ,
चौखट पे यकायक,
उडती ही फ़िरती बस,
अभी देखो…
बस अभी,
मेरे कांन्धे से सट के गुज़री है,
कुछ जानी देखी सूरत है,
अब मेरे साथ ही चलती है,
हर रात कहानी बुनती है,
हाथ पकड़ कर घड़ियों का,
घन्टों बातें करती है,
आंखों में गीली मिसरी है,
कुछ यादें भूली बिसरी हैं,
इस कागज़ पे बिखरी हैं,
हर लम्हा बस कहता है,
मेरे साथ भी कोई रहता है,
गम के आंसू पीकर वो,
मेरे पास सिसकता कहता है,
मेरे साथ भी कोई रहता है……
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